Kavya prayojan (काव्य-प्रयोजन)


काव्य-प्रयोजन (Kavya prayojan)

  • 'काव्य प्रयोजन का तात्पर्य है 'काव्य रचना का उद्देश्य'। वस्तुतः कावय प्रयोजन काव्य प्ररेणा से अलग है क्योंकि कावय प्रेरणा का अभिप्राय है। कावय की रचना के लिए प्रेरित करने वाले तत्व जबकि काव्य प्रयोजन का अभिप्राय है काव्य रचना के अनन्तर प्राप्त होने वाले लाभ।
  • आचार्यों। ने निम्नलिखित काव्य प्रयोजन बताए है-
  • आचार्य काव्य प्रयोजन
    भरत मुनि (1) धर्म (2) यश (3) आयुष (4) हित (5) बुद्धिवृद्धि (6) लोक उपदेश (7) दक्षता (8) चरम विश्रांति प्राप्ति।
    भामह (1) चतुर्वर्ग फलप्राप्ति (2) कीर्ति (3) सकल कला-ज्ञान (4) प्रीति।
    दण्डी (1) लोक व्युत्पत्ति
    वामन (1) कीर्ति (2) प्रीति
    रुद्रट (1) धर्म (2) कीर्ति (3) अनर्थोपशम (4) अर्थ (5) सुख प्राप्ति।
    आनन्द वर्धन (1) विनयन्समुखीकरण (2) प्रीति।
    कुन्तक (1) चतुर्वर्गफल प्राप्ति (2) व्यवहार ज्ञान (3) परमाह्याद।
    महिम भट्ट (1) रसमय सदुपदेश (2) परमाह्राद।
    अभिनव गुप्त (1) चतुर्वर्गफल प्राप्ति (2) जायासम्मति उपदेश (3) परमानन्द (4) यश।
    भोज (1) कीर्ति (2) प्रीति।
    मम्मट (1) यश प्राप्ति (2) वित्तीय लाभ (3) लोक व्यवहार (4) शिवेतर क्षतये (अमगल का नाश) (5) सद्यपर निर्वृति (तत्काल परमानन्द की प्राप्ति) (6) कान्ता सम्मित उपदेश।

  • हिन्दी के आचार्यो के अनुसार काव्य प्रयोजन निम्नलिखित है-
    (1) ''जिस सम्पति आनन्द अति दुरितन डोर सोइ
    होत कवित तें चतुराई जगत राम बस होइ।।-कूलपति मिश्र
  • (2) 'रहत घर न वर धाम धन, तरुवर सरवर कूप।
    जस सरीर जग में अमर, भव्य काव्य रस रूप।'' -देव

    (3) ''कीरति वित्त विनोद अरु अति मंगल को देति।
    करै भलो उपदेश नित वह कवित्त चित्त चेति।।'' -सोमनाथ

    (4) ''एक लहैं तप-पुंजन्ह के फल ज्यों तुलसी अरु सूर गोसाई।
    एक लहैं बहु सम्पति केशव, भूषण ज्यो बरवीर बड़ाई।।
    एकन्ह को जसही सों प्रयोजन है रसखानि रहीम की नाई।
    दास कवित्तन्ह की चरचा बुधिवन्तन को सुख दै सब ठाई।'' -भिखारीदास

    (5) 'केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए।
    उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।। -मैथलीशरण गुप्त

    (6) ''कविता का अन्तिम लक्ष्य जगत के मार्मिक पक्षों का प्रत्यक्षीकरण करके
    उनके साथ मनुष्य-हृदय का सामंजस्य स्थापन है।'' -रामचन्द्र शुक्ल